आखिर इस नश्वर संसार में ये इतना अहंकार किस लिए ?

सन 1972 में आई बॉलीवुड फिल्म ललकार में मोहम्मद रफी का एक गाना था - " गा लो मुस्कुरा लो महफिलें सजा लो, क्या जाने कल कोई साथी छूट जाए। जीवन की डोर बड़ी कमजोर, किसको खबर कब कहाँ टूट जाये।"

सचमुच बहुत ही सार्थक गीत लिखा गया था जो जीवन की क्षणभंगुरता को दर्शाता है। पर इंसान है कि जीवन भर ना जाने किस बात का घमंड करता है, और एक दिन आता है जब उसकी हस्ती ही मिट जाती है। शायद तन का घमंड होता है या शायद धन का। परन्तु कब तक ? ये सब तो यहीं रह जाना है। मनुष्य शारीरिक सुखों में इस प्रकार लिप्त हो जाता है कि कूएँ का मेंढक बन कर रह जाता है। अहंकारी हो जाता है। छोटी-छोटी बातों में सारा जीवन नष्ट कर देता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार में जकड़ जाता है और भूल जाता है कि ये जीवन क्षणभंगुर है। किस पल खत्म हो जाये, अकल्पनीय है। ऐसे में जरूरत है कि क्षणिक सुखों के लिए भटकने की जगह जीवन को ही सुखमय बनाने का प्रयास करें। आखिर अंत में तो इस संसार रूपी सागर में डूबना ही है तो किस लिए जीवन भर हार-जीत के लिए द्वंद करना। क्यों क्षणिक सुखों के लिए स्वयं और दूसरों को पीड़ा पहूँचाना। किसलिए ये अहंकार ? जीवन के इसी सत्य से जुड़ा एक छोटा सा प्रसंग प्रस्तुत कर रहा हूँ। आशा है आपको पसंद आएगा।

एक नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, और तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर- उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली।

वह सोचने लगा, अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं?

कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा।भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। 

अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।

नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था।

किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई।चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था,जहां उसके लिए न भोजन था,न पेयजल और न ही कोई आश्रय।सब ओर सीमा हीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।

कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछलीऔर टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा,किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया। 

glass of wine Caption

शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है,जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार रूपी सागर में समा जाते है।

आखिर ये जीत किसके लिए, ये हार किसके लिए।

ज़िंदगी भर ये तकरार किसके लिए।

जो भी आया है वो एक दिन जायेगा ही।

कुछ  दिन की जिंदगानी...फिर... ये इतना अहंकार किस  लिए।

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