वसीयत बंटवारा - माँ बेटे का नैतिक प्रसंग

वसीयत बंटवारा

पाश्चात्य संस्कृति की देखा-देखी और आधुनिक दिखने की गर्मा-गर्मी ने हम भारतीयों को भी अनायास ही कुछ ऐसे आयोजन और अनुष्ठान करने पर विवश कर दिया है जो हमारी सभ्यता और संस्कृति का उपहास मात्र है। आपको एक ताजा उदाहरण देता हूँ। कुछ दिन पहले Mothers Day मनाया गया और फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, डुकली आदि सोशल साइट्स पर माँ से सम्बंधित पोस्ट और स्टेटस की जैसे बाढ़ सी आ गयी। जो लोग अपनी माँ को कहीं किसी से मिलवाने से भी कतराते हैं या इसकी आवश्यकता भी नहीं समझते, वे लोग भी माँ के साथ सेल्फी खींच कर शेयर कर रहे हैं कि देखो दुनिया वालों मैं अपनी माँ को कितना मानता हूँ। परन्तु मनन करने योग्य विषय है कि क्या माँ के सम्मान के लिए भी किसी निश्चित दिन की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है ?  अरे माँ तो हर रोज एक दिवस है। प्रति क्षण पूजनीय है। और माँ बिना जो दिवस है वो क्या खाक दिवस है। ऐसे में अधिकतर लोगों द्वारा साल के किसी दिन विशेष को ये आडम्बर करने की क्या आवश्यकता है ? चलिए विषय से जुड़ा एक प्रसंग पढ़ लेते हैं, शायद आपके-हमारे विचारों को कुछ अधिक स्पष्टता और स्थिरता मिले।

"एक घर मे तीन भाई और एक बहन थी...बड़ा और छोटा पढ़ने मे बहुत तेज थे। उनके मा बाप उन चारो से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे। 

बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डाक्टर बन गया। छोटा भी पढ लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल आवारा और गंवार बनके ही रह गया। सबकी शादी हो गई । बहन और मझले को छोड़ दोनों भाईयो ने Love मैरीज की थी।

बहन की शादी भी अच्छे घराने मे हुई थी। आखीर भाई साहब डाक्टर इंजीनियर जो थे। अब मझले को कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बाप भी परेशान मां भी। बहन जब भी मायके आती सबसे पहले छोटे भाई और बड़े भैया से मिलती। मगर मझले से कम ही मिलती थी। क्योंकि वह न तो कुछ दे सकता था और न ही वह जल्दी घर पे मिलता था। वैसे वह दिहाडी मजदूरी करता था। पढ़ नहीं सका तो...नौकरी कौन देता। मझले की शादी कीये बिना बाप गुजर गये ।

VILLAGE PAINTING Caption

 

माँ ने सोचा कहीं अब बँटवारे की बात न निकले इसलिए अपने ही गाँव से एक सीधी साधी लड़की से मझले की शादी करवा दी। शादी होते ही न जाने क्या हुआ की मझला बड़े लगन से काम करने लगा ।

दोस्तों ने कहा... ए चन्दू आज अड्डे पे आना।

चंदू - आज नहीं फिर कभी 

दोस्त - अरे तू शादी के बाद तो जैसे बिबी का गुलाम ही हो गया? 

चंदू - अरे ऐसी बात नहीं । कल मैं अकेला एक पेट था तो अपने रोटी के हिस्से कमा लेता था। अब दो पेट है आज, कल और होगा। घरवाले नालायक कहते थे कहते हैं मेरे लिए चलता है। मगर मेरी पत्नी मुझे कभी नालायक कहे तो मेरी मर्दानगी पर एक भद्दा गाली है। क्योंकि एक पत्नी के लिए उसका पति उसका घमंड, इज्जत और उम्मीद होता है। उसके घरवालो ने भी तो मुझपर भरोसा करके ही तो अपनी बेटी दी होगी...फिर उनका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ । कालेज मे नौकरी की डिग्री मिलती है और ऐसे संस्कार मा बाप से मिलते हैं ।

इधर घरपे बड़ा और छोटा भाई और उनकी पत्नीया मिलकर आपस मे फैसला करते हैं की...जायदाद का बंटवारा हो जाये क्योंकि हम दोनों लाखों कमाते है मगर मझला ना के बराबर कमाता है। ऐसा नहीं होगा।

मां के लाख मना करने पर भी...बंटवारा की तारीख तय होती है। बहन भी आ जाती है, मगर चंदू है की काम पे निकलने के लिए बाहर आता है। उसके दोनों भाई उसको पकड़कर भीतर लाकर बोलते हैं की आज तो रूक जा? बंटवारा कर ही लेते हैं । वकील कहता है ऐसा नहीं होता। साईन करना पड़ता है।

चंदू - तुम लोग बंटवारा करो मेरे हिस्से मे जो देना है दे देना। मैं शाम को आकर अपना बड़ा सा अगूंठा चिपका दूंगा पेपर पर।

बहन- अरे बेवकूफ ...तू गंवार का गंवार ही रहेगा। तेरी किस्मत अच्छी है की तू इतनी अच्छे भाई और भैया मिलें

मां- अरे चंदू आज रूक जा।

बंटवारे में कुल दस विघा जमीन मे दोनों भाई 5- 5 रख लेते हैं।और चंदू को पुस्तैनी घर छोड़ देते है। तभी चंदू जोर से चिल्लाता है।

अरे???? फिर हमारी छुटकी का हिस्सा कौन सा है?

दोनों भाई हंसकर बोलते हैं। अरे मूरख...बंटवारा भाईयो मे होता है और बहनों के हिस्से मे सिर्फ उसका मायका ही है।

चंदू - ओह... शायद पढ़ा लिखा न होना भी मूर्खता ही है। ठीक है आप दोनों ऐसा करो। मेरे हिस्से की वसीएत मेरी बहन छुटकी के नाम कर दो।

दोनों भाई चकीत होकर बोलते हैं। और तू?

चंदू मां की और देखके मुस्कुरा के बोलता है - मेरे हिस्से में माँ है न......फिर अपनी बिबी की ओर देखकर बोलता है..मुस्कुराके...क्यों चंदूनी जी...क्या मैंने गलत कहा? 

चंदूनी अपनी सास से लिपटकर कहती है। इससे बड़ी वसीएत क्या होगी मेरे लिए की मुझे मां जैसी सासु मिली और बाप जैसा ख्याल रखने वाला पति।

VILLAGE Family painting Caption

 

बस येही शब्द थे जो बँटवारे को सन्नाटा मे बदल दिया। बहन दौड़कर अपने गंवार भैया से गले लगकर रोते हुए कहती है की..मांफ कर दो भैया मुझे क्योंकि मैं समझ न सकी आपको।

चंदू - इस घर मे तेरा भी उतना ही अधिकार है जितना हम सभी का। बहुओं को जलाने की हिम्मत कीसी मे नहीं मगर फिर भी जलाई जाती है क्योंकि शादी के बाद हर भाई, हर बाप उसे पराया समझने लगते हैं । मगर मेरे लिए तुम सब बहुत अजीज हो चाहे पास रहो या दुर।

माँ का चुनाव इसलिए किया ताकी तुम सब हमेशा मुझे याद आओ। क्योंकि ये वही कोख है जंहा हमने साथ साथ 9 - 9 महीने गुजारे। मां के साथ तुम्हारी यादों को भी मैं रख रहा हूँ। 

दोनों भाई दौड़कर मझले से गले मिलकर रोते-रोते कहते हैं - आज तो तू सचमुच का बाबा लग रहा है। सबकी पलकों पे पानी ही पानी। सब एक साथ फिर से रहने लगते है।"

आशा है प्रसंग आपको पसन्द आया होगा। जैसा भी हो नीचे कॉमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर लिखें और पोस्ट को शेयर करें ताकि हम आपके अनुरूप ही और पोस्ट्स लाते रहें।

अंत में इन्ही पंक्तियों के साथ समाप्त करता हूँ कि "हालात बुरे थे मगर रखती थी वो हमेशा अमीर बनाकर। हम भी तो गरीब ही हैं, ये बात बस माँ जानती थी।" इसलिए Mothers Day की औपचारिकता मत करो। अपनी माँ पर प्रतिक्षण गर्व करो की वो तुम्हारी माँ है। उसे खुश रखने का हर सम्भव प्रयास करो। माँ है तो जीवन है।

The best medicine in the world is a motherly hug.

डूकली प्रसंग

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